एक माँ सिर्फ जन्म नहीं देती, वह जीवन भर अपने बच्चों के लिए जीती है।
यह कहानी है सीता देवी की, जो एक छोटे से गाँव में अपने दो बच्चों के साथ रहती थीं। उनके पति की मौत बहुत पहले हो गई थी। सीता देवी ने मजदूरी करके अपने बच्चों को पाला, पढ़ाया और अच्छे संस्कार दिए।
सुबह 5 बजे उठकर खेतों में काम करना और रात को बच्चों के कपड़े सिलना — यही उनका जीवन था। उन्होंने कभी किसी से शिकायत नहीं की। जब बच्चों को भूख लगती थी, तो खुद भूखे पेट सो जाती थीं लेकिन बच्चों के चेहरे पर भूख की लकीर तक नहीं आने देती थीं।
समय बीता, बच्चे बड़े हुए। एक बेटा शहर जाकर नौकरी करने लगा और बेटी की शादी भी हो गई। लेकिन आज भी माँ सीता देवी उसी टूटी-फूटी झोपड़ी में अकेली रहती हैं।
बेटे ने वादा किया था, "माँ, मैं आपको लेने आऊँगा..."
लेकिन वो दिन कभी नहीं आया।
सीता देवी हर शाम दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देखती रहती हैं, शायद आज बेटा आए... शायद आज कोई कहे, "माँ, चलो घर चलते हैं।"
☝👋
लेकिन अब वो बूढ़ी आँखें धीरे-धीरे बुझ रही हैं... और उस ममता की छांव भी अकेली रह गई है।
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"माँ सिर्फ जननी नहीं होती, वो भगवान का दूसरा रूप होती है – उसकी कदर करना सीखो, वरना पछताने का समय नहीं मिलेगा।"
Mr.Sanjay raj
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