तेरे नाम से शुरू हुई थी मोहब्बत: एक अधूरी दास्तां | Love Story Part 2

 तेरे नाम से शुरू हुई थी मोहब्बत: एक अधूरी दास्तां | Love Story Part 2

वक़्त की रफ़्तार कभी किसी के लिए नहीं रुकती। पर कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जो वक़्त की किताब में दर्ज हो जाते हैं, जैसे पत्थर पर उकेरे गए नाम। रिया और आरव की कहानी भी कुछ वैसी ही थी। Part 1 में जहां कहानी छूटी थी, वहीं से यह अध्याय शुरू होता है...






रिया की शादी हो चुकी थी। उस दिन जब उसने कहा था, “मैं किसी और के साथ आगे बढ़ रही हूँ,” आरव के भीतर कुछ टूटकर बिखर गया था।

वो आरव, जिसने अपने हर ख्वाब में रिया को देखा था, अब आईने में जब खुद को देखता था, तो सिर्फ एक खालीपन नजर आता था। दोस्तों ने बहुत समझाया, “भूल जा उसे, नई शुरुआत कर,” लेकिन आरव जानता था—रिया को भुलाना उतना आसान नहीं जितना शब्दों में कहा जाता है।

वो हर शाम उस पुरानी पार्क की बेंच पर बैठा करता, जहां कभी रिया उसके साथ बैठा करती थी। उसके मन में अब भी उम्मीद की एक नन्ही लौ जल रही थी, शायद रिया एक दिन लौट आए। पर वो दिन कभी नहीं आया… कम से कम इतनी जल्दी नहीं।


छह महीने बाद...

एक ठंडी रात थी। दिसंबर की सर्दी जैसे दिल की ठंडक से मेल खा रही हो। आरव ने मोबाइल उठाया और पुराने मैसेजेस पढ़ने लगा। हर मैसेज, हर तस्वीर एक तीर की तरह दिल को चीरती जा रही थी। तभी फोन बजा। स्क्रीन पर नाम चमका—रिया।

आरव की धड़कनें एक पल को थम सी गईं। उसने काँपते हाथों से कॉल उठाई:

"हैलो आरव... मैं रिया बोल रही हूँ..."

एक पल को दोनों खामोश रहे। फिर रिया की आवाज़ टूटी, "मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई आरव... मैं खुश नहीं हूँ...".

आरव की आंखों से आंसू छलक पड़े, पर आवाज़ में सख्ती थी, "क्यों किया ये सब? जब मैं तुझसे सिर्फ प्यार चाहता था, तेरा साथ चाहता था... तब तूने मुझे छोड़ दिया।"

रिया रो रही थी, "मुझे लगा था कि पैसे, स्टेटस, और फैमिली की पसंद से जिंदगी बेहतर हो जाएगी, पर... सब खो दिया मैंने।"

आरव ने लंबी सांस ली और बोला, "रिया, कुछ अधूरी कहानियाँ मुकम्मल नहीं होतीं।
कुछ प्यार वापस नहीं आते… और कुछ जख्म… बस याद बन जाते हैं…"

फोन कट हो गया। उस रात आरव फिर नहीं सो पाया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दिल की सुनी जाए या दिमाग की।


रिया की कहानी:

शादी के बाद रिया को लगा था कि उसका फैसला सही था। अंकित, उसका पति, एक अमीर बिजनेसमैन था। महल जैसा घर, गाड़ी, नौकर-चाकर सब कुछ था, सिवाय एक चीज के—प्यार।

रिया हर रोज़ उस घर में जैसे कैद थी। उसका मन हर रोज़ आरव की बातें, उसकी मुस्कान, उसके छोटे-छोटे प्यार भरे मैसेज को याद करता था। अंकित बिजनेस में व्यस्त रहता, और जब रहता भी, तो बातों में सिर्फ अहंकार होता।

एक दिन रिया ने आरव की तस्वीर को देखा, जो अब भी उसकी पुरानी डायरी में थी। उस तस्वीर को सीने से लगाकर वो फूट-फूटकर रोई।

उस दिन उसने हिम्मत की और कॉल किया… पर अब बहुत देर हो चुकी थी। आरव अब पहले जैसा मासूम नहीं रहा था। वक्त ने उसे मजबूत और कठोर बना दिया था।


नया मोड़:

कुछ हफ्ते बीते। रिया दोबारा कॉल नहीं कर सकी। आरव भी अपने जीवन में व्यस्त हो गया था। उसने अब एक NGO में बच्चों के लिए काम करना शुरू किया। ज़िंदगी में अब उसे दूसरों की मुस्कुराहट में सुकून मिलने लगा था।

पर एक दिन, एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला, “भाईया, ये चिट्ठी आपको एक दीदी ने दी है।”

आरव ने चौंक कर पूछा, “कौन दीदी?” बच्चा भाग गया।

चिट्ठी खोली—रिया की लिखावट थी:

_"माफ करना आरव,

मैंने जब तुम्हें छोड़ा, तब सोचा था कि तुम मेरे बिना जी नहीं पाओगे। पर आज देख रही हूँ, तुम और भी मजबूत बन गए हो। पर मैं... मैं अब भी वहीं ठहरी हूँ।

शायद तुम्हारा प्यार ही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी और मेरा अहंकार हमारी मोहब्बत की सबसे बड़ी हार।

अगर कभी माफ कर सको... तो मुझे वही पुरानी पार्क की बेंच पर एक बार मिलना।

– रिया"_


आख़िरी मुलाक़ात:

आरव तय समय पर पार्क की उसी बेंच पर पहुँचा। सामने रिया बैठी थी—कमज़ोर, उदास, पर अब भी वैसी ही खूबसूरत।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा, पर कुछ नहीं कहा। कुछ मिनट यूँ ही बीत गए। फिर आरव बोला:

"रिया, क्या चाहती हो अब?"

रिया की आँखों में आँसू थे, "सिर्फ माफी नहीं, एक और मौका। मैं तुम्हारे साथ फिर से ज़िंदगी शुरू करना चाहती हूँ।"

आरव ने लंबी चुप्पी के बाद कहा, "रिया, मैंने तुझे हर रूप में चाहा... पर अब मेरा प्यार खुद से भी बढ़ गया है। मैं तुझे माफ कर सकता हूँ, लेकिन तेरे साथ फिर से वही रिश्ता नहीं निभा सकता।"

रिया फूट-फूटकर रो पड़ी। आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला:

"तू हमेशा मेरे दिल में रहेगी… तेरे नाम से मेरी मोहब्बत शुरू हुई थी, और शायद उसी नाम पर खत्म भी हो जाए। लेकिन अब मेरी जिंदगी उन बच्चों के नाम है जिन्हें मेरे जैसे प्यार की तलाश है।".

रिया ने उसकी आँखों में देखा… कोई शिकवा नहीं था, बस एक सुकून था। शायद यही प्यार की परिभाषा होती है—छोड़ देना, जब थामना नुकसान पहुँचा दे।


अंत:

आरव चला गया, पर इस बार टूटकर नहीं… मजबूत होकर।
रिया वहीं बैठी रही, उस बेंच पर… उस अधूरी दास्तां को पूरा करने की उम्मीद में जो शायद अब कभी मुकम्मल नहीं होगी।

कुछ कहानियाँ अधूरी ही खूबसूरत होती हैं… और यह कहानी उन्हीं में से एक थी…

To Be Continued...?



MR ... SANJAY RAJ

  Thanks for next story ke sath.  


Comments