गाँव की मिट्टी में बसी एक पुरानी हवेली थी, जहाँ रहती थी **श्यामा देवी**, जिनकी उम्र अब 68 के पार हो चुकी थी। सफेद बालों की चोटी, माथे पर लाल बिंदी, और चेहरे पर झुर्रियाँ—पर आँखों में अब भी वही ममता की चमक थी।
उनका बेटा **अमित**, जो कभी उनकी गोद में खेलता था, अब एक बड़ा अफसर बन गया था। शहर में रहता था, बड़ी कोठी, गाड़ी, सबकुछ था। लेकिन माँ... माँ आज भी उसी पुराने गाँव में, उसी टूटी-सी हवेली में रहती थी। वो हर दिन दरवाज़े की ओर देखती थी, जैसे कोई आने वाला हो।
#### **अतीत की परछाइयाँ:**
अमित बचपन से ही होशियार था। श्यामा देवी ने अपने गहने बेचकर, खेत गिरवी रखकर उसे पढ़ाया था। पति की मौत के बाद, उन्हीं की दुनिया में अमित ही एकमात्र सहारा बन गया था।
जब अमित शहर गया पढ़ाई के लिए, तो माँ हर दिन एक ही बात कहती—"बेटा, कुछ बन जा, फिर मुझे अपने साथ ले जाना... बस इतना ही सपना है।"
अमित ने माँ से वादा किया था, लेकिन वक़्त और ज़िम्मेदारियाँ इंसान को बदल देती हैं।
#### **अब की ज़िन्दगी:**.
अमित अब शादीशुदा था। पत्नी निशा, एक आधुनिक सोच वाली महिला थी। उसे गाँव की ज़िन्दगी, मिट्टी की खुशबू, माँ की झुर्रियाँ—सब बेकार लगते थे। अमित माँ को लेने की सोचता, पर हर बार निशा के कारण रुक जाता।
श्यामा देवी हर त्यौहार पर थाली सजाकर बेटे का इंतज़ार करती। छत पर झंडियाँ बांधती, अपने हाथों से लड्डू बनाती। पर हर बार वही खामोशी, वही खाली राहें।
एक बार गाँव के डॉक्टर ने बताया कि श्यामा देवी का **ब्लड प्रेशर और शुगर दोनों बढ़ते जा रहे हैं**, लेकिन वो इलाज से ज़्यादा बेटे की चिट्ठी का इंतज़ार करती थीं।
#### **एक चिट्ठी, एक बदलाव:**
एक दिन अमित को अपने बचपन की एक पुरानी डायरी मिली। माँ ने लिखी थी। हर पन्ने पर था—**"मेरा बेटा आज पहली बार स्कूल गया", "आज वो रोया, मैंने गोद में लिया", "आज उसका रिजल्ट आया, मैंने पूरे गाँव को मिठाई खिलाई..."**.
अमित की आँखें भर आईं। उसने तुरंत छुट्टी ली और गाँव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में हर मोड़ पर उसे अपनी माँ की बातें याद आ रही थीं—उनका हाथ पकड़ कर खेतों में दौड़ना, रात में लोरी सुनाना, और बारिश में भीगते हुए भुट्टा खिलाना।
#### **मुलाक़ात के आँसू:**
जब वो गाँव पहुँचा, माँ आँगन में बैठी तुलसी को पानी दे रही थीं। अचानक अमित की आवाज़ आई—"माँ..." बस एक शब्द। और माँ जैसे ठहर गईं। वो भागकर आईं, काँपते हाथों से बेटे को छुआ—"सच में तू आ गया? सपना तो नहीं?"
अमित ने माँ के पैर पकड़ लिए। "माँ, माफ़ कर दो... बहुत देर कर दी।"
माँ ने आँचल से उसकी आँखें पोंछ दीं, "देर तो हुई, पर तू आया तो सही। अब और कुछ नहीं चाहिए।"
#### **सुकून की रात:**
उस रात माँ ने खटिया बिछाई, और अमित उनकी गोद में सिर रखकर लेट गया। माँ ने बाल सहलाते हुए पूछा—"शहर में सब ठीक है?"
अमित ने जवाब दिया, "अब सब ठीक होगा, माँ। मैं आपको साथ ले जाने आया हूँ।"
माँ मुस्कुरा दीं, "पर मुझे कहीं नहीं जाना बेटा, मेरा घर यहीं है, मेरा सुख यहीं है... बस तू कभी-कभी आता रहना, और मेरी गोद यूँ ही मांगता रहना।"
#### **एक नई शुरुआत:**
अमित ने गाँव में एक छोटा-सा अस्पताल खुलवाया। माँ को वहीं इलाज मिला और वो अब पहले से स्वस्थ थीं। शहर से हर हफ्ते आता, माँ के साथ दो दिन बिताता।
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## **अंतिम पंक्तियाँ:**
"एक माँ का आँचल कभी छोटा नहीं होता,
उसमें हर दर्द का इलाज छुपा होता है।
वक़्त भले ही आगे बढ़ जाए,
पर माँ की ममता हमेशा वहीं रहती है,
जहाँ से हमने चलना सीखा था।".
MR...... SANJAY RAJ.
To be cantine
Milte hai next story ke sath


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